Friday, 4 May 2018

Allahabad High Court Challenges Its Own Decision In The Supreme Court - इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने ही फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

Allahabad High Court Challenges Its Own Decision In The Supreme Court -
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने ही फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
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हाईकोर्ट के पारिवारिक अदालतों की देखरेख के सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट अपने ही फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। उसकी अपील पर जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर भानुमति की पीठ ने प्रतिवादी और उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब देने को कहा है। हाईकोर्ट की ओर से जगजीत सिंह छाबड़ा और यशवर्धन मामले की पैरवी कर रहे हैं।
 
इस मामले में मुख्य मुद्दा उत्तर प्रदेश में पारिवारिक अदालतों की देखरेख की जिम्मेदारी हाईकोर्ट को दिए जाने के विरोधाभाषी नियमों को लेकर है। राज्य सरकार द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 1995 के नियम 36 कहता है कि सभी पारिवारिक अदालतें हाईकोर्ट की देखरेख में काम करेंगी। 

हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 2006 के नियम 58 के अनुसार पारिवारिक अदालत के जज जिला जज की प्रशासनिक एवं अनुशासनात्मक देखरेख के तहत आएंगे। अलबत्ता, इन पर हाईकोर्ट का पूर्ण नियंत्रण होगा।

उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन ने नियम 58 को खत्म करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने इसके 1995 की नियमावली के नियम 26 के विरोधाभाषी होने और संविधान के अनुच्छेद 235 का उल्लंघन करने की दलील दी थी। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए मामले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक इकाई के पास भेजने का निर्देश दिया था। ताकि नियम 58 के लिए उपयुक्त संशोधन किया जा सके और पारिवारिक अदालतों को प्रभावी तरीके से हाईकोर्ट की देखरेख में लाया जा सके। इसी फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।

याचिकाकर्ता की दलील -
1- हाईकोर्ट का उत्प्रेषण आज्ञापत्र जारी करना और उसी अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पेश करने को कहना न्यायिक अधिकारों के दायरे से आगे जाना है। हाईकोर्ट सिर्फ निचली अदालतों के खिलाफ ही उतप्रेषण आज्ञापत्र जारी कर सकता है, न कि अपने खिलाफ। ऐसा करके हाईकोर्ट ने अपने अधिकारक्षेत्र को लांघा है और यह फैसला कानूनन सही नहीं है। 
2- पारिवारिक अदालत अधिनियम, 1984 के अनुसार, पारिवारिक अदालत के कामकाज के लिए नियम बनाने का अधिकार भले ही राज्य सरकार के साथ-साथ हाईकोर्ट को हो लेकिन नियुक्तियों आदि के मामले में अंतिम फैसला हाईकोर्ट का ही होता है। ऐसा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए किया गया है।
3- उत्तर प्रदेश की वित्तीय स्थिति को देखते हुए यह संभव नहीं है कि जिला जज के पद वाले उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी को पारिवारिक अदालत का मुख्य जज बनाया जाए। 



हाईकोर्ट के पारिवारिक अदालतों की देखरेख के सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट अपने ही फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। उसकी अपील पर जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर भानुमति की पीठ ने प्रतिवादी और उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब देने को कहा है। हाईकोर्ट की ओर से जगजीत सिंह छाबड़ा और यशवर्धन मामले की पैरवी कर रहे हैं।


 
इस मामले में मुख्य मुद्दा उत्तर प्रदेश में पारिवारिक अदालतों की देखरेख की जिम्मेदारी हाईकोर्ट को दिए जाने के विरोधाभाषी नियमों को लेकर है। राज्य सरकार द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 1995 के नियम 36 कहता है कि सभी पारिवारिक अदालतें हाईकोर्ट की देखरेख में काम करेंगी। 

हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 2006 के नियम 58 के अनुसार पारिवारिक अदालत के जज जिला जज की प्रशासनिक एवं अनुशासनात्मक देखरेख के तहत आएंगे। अलबत्ता, इन पर हाईकोर्ट का पूर्ण नियंत्रण होगा।

उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन ने नियम 58 को खत्म करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने इसके 1995 की नियमावली के नियम 26 के विरोधाभाषी होने और संविधान के अनुच्छेद 235 का उल्लंघन करने की दलील दी थी। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए मामले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक इकाई के पास भेजने का निर्देश दिया था। ताकि नियम 58 के लिए उपयुक्त संशोधन किया जा सके और पारिवारिक अदालतों को प्रभावी तरीके से हाईकोर्ट की देखरेख में लाया जा सके। इसी फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।

याचिकाकर्ता की दलील -
1- हाईकोर्ट का उत्प्रेषण आज्ञापत्र जारी करना और उसी अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पेश करने को कहना न्यायिक अधिकारों के दायरे से आगे जाना है। हाईकोर्ट सिर्फ निचली अदालतों के खिलाफ ही उतप्रेषण आज्ञापत्र जारी कर सकता है, न कि अपने खिलाफ। ऐसा करके हाईकोर्ट ने अपने अधिकारक्षेत्र को लांघा है और यह फैसला कानूनन सही नहीं है। 
2- पारिवारिक अदालत अधिनियम, 1984 के अनुसार, पारिवारिक अदालत के कामकाज के लिए नियम बनाने का अधिकार भले ही राज्य सरकार के साथ-साथ हाईकोर्ट को हो लेकिन नियुक्तियों आदि के मामले में अंतिम फैसला हाईकोर्ट का ही होता है। ऐसा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए किया गया है।
3- उत्तर प्रदेश की वित्तीय स्थिति को देखते हुए यह संभव नहीं है कि जिला जज के पद वाले उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी को पारिवारिक अदालत का मुख्य जज बनाया जाए। 





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Nirbhaya Case: Decision On The Plea Of The Guilty - निर्भया मामला: दोषियों की पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित

Nirbhaya Case: Decision On The Plea Of The Guilty - निर्भया मामला:
दोषियों की पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित
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अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Updated Fri, 04 May 2018 10:49 PM IST





सुप्रीम कोर्ट



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निर्भया गैंगरेप व हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को दोषियों की पुनर्विचार याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया। दोषियों की ओर से कहा गया कि यह मामला फांसी का सजा का बनता ही नहीं है। मालूम हो कि विनय, पवन और मुकेश ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर की हैं लेकिन अक्षय ने अब तक पुनर्विचार याचिका नहीं दायर की है। 


दोषी विनय और पवन की ओर से पेश वकील ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ केसमक्ष कहा कि दोषी गरीब पृष्ठभूमि से हैं। वे आदतन अपराधी नहीं हैं। उन्हें सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए। वहीं दिल्ली पुलिस की ओर से पेश वकील ने कहा कि दोषियों की इन दलीलों को पहले ही ठुकराया जा चुका है। 

बहरहाल पीठ ने इस दोषियों की पुनर्विचार याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया। पीठ ने कहा कि अगर कोई पक्ष लिखित दलीलें पेश करना चाहता है तो वह आठ मई तक पेश कर सकता है। मालूम हो कि निचली अदलत ने दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी। बाद में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने सजा को बरकरार रखा था।  





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जीएसटी: 6 महीने में लागू होगी मंथली सिंगल रिटर्न व्यवस्था, डिजिटल पेमेंट पर छूट पर नहीं हुआ फैसला

जीएसटी: 6 महीने में लागू होगी मंथली सिंगल रिटर्न व्यवस्था, डिजिटल पेमेंट पर छूट पर
नहीं हुआ फैसला
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नई दिल्ली. जीएटसी काउंसिल की बैठक में व्यापारियों के लिए सिंगल रिटर्न की व्यवस्था लागू करने का फैसला लिया गया। मंथली सिंगल रिटर्न की व्यवस्था 6 महीने में लागू हो जाएगी, जिसके बाद कारोबारियों को तीन रिटर्न भरने से राहत मिलेगी। शुक्रवार को हुई काउंसिल की बैठक में चीनी पर सेस लगाने और डिजिटल पेमेंट पर टैक्स में छूट के प्रस्ताव पर फैसला नहीं हो पाया। हालांकि, फिलहाल चीनी पर सेस नहीं लगाया जाएगा। दोनों मामले राज्यों के वित्त मंत्रियों के समूह को सौंप दिए गए हैं। जीएसटी 27वीं बैठक में जीएसटी नेटवर्क को सरकारी कंपनी बनाने पर भी फैसला लिया गया है। इसके तहत 50% हिस्सेदारी केंद्र के पास और 50% हिस्सेदारी संयुक्त रूप से राज्यों के पास रहेगी।


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Thursday, 3 May 2018

कर्नाटक के लिए भाजपा का घोषणापत्र: 1 लाख रुपए तक का फसली कर्ज माफ होगा, महिलाओं को मुफ्त स्मार्टफोन

कर्नाटक के लिए भाजपा का घोषणापत्र: 1 लाख रुपए तक का फसली कर्ज माफ होगा,
महिलाओं को मुफ्त स्मार्टफोन
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कर्नाटक चुनाव के लिए भाजपा ने शुक्रवार को घोषणापत्र जारी कर दिया। इसमें उन्होंने कृषि क्षेत्र के लिए कई योजनाओं का एलान किया। किसानों को 1 लाख रुपए तक फसल कर्ज माफ करने के साथ किसानों तक पानी पहुंचाने के लिए 1.50 लाख करोड़ रूपए के सिंचाई प्रोजेक्ट्स और 1 लाख रूपए तक के फसल कर्ज माफ कर दिए जाएंगे। वहीं, बीपीएल परिवारों को स्मार्टफोन और कॉलेज छात्रों को लैपटॉप देने का वादा किया।


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केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट से SC/ST एक्ट संबंधी अपने फैसले पर रोक लगाने का किया आग्रह

केन्द्र ने सुप्रीम कोर्ट से SC/ST एक्ट संबंधी अपने फैसले पर रोक लगाने का किया आग्रह
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नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी/एसटी एक्ट को लेकर दिए निर्णय पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार गुरुवार को कोर्ट से अनुरोध किया. इस पर शीर्ष अदालत ने कहा कि वह इन समुदायों के अधिकारों के संरक्षण और उनके प्रति अत्याचार करने के दोषी व्यक्तियों को दंडित करने का सौ फीसदी हिमायती है. न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल और न्यायमूर्ति उदय यू ललित की पीठ ने यह टिप्पणी उस वक्त की जब केन्द्र की ओर से अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने इस मामले में न्यायालय के फैसले पर रोक लगाने का अनुरोध किया. 


उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत ऐसे नियम या दिशानिर्देश नहीं बना सकती जो विधायिका द्वारा पारित कानून के विपरीत हों. वेणुगोपाल ने अनुसूचित जाति - जनजाति कानून से संबंधित मामले में शीर्ष अदालत के फैसले को वृहद पीठ को सौंपने का अनुरोध करते हुये कहा कि इस व्यवस्था की वजह से जानमाल का नुकसान हुआ है. 


यह भी पढ़ेंः SC/ST कानून पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को पलटने के लिए अध्यादेश का मसौदा तैयार कर रहा है केंद्र


पीठ ने अपने 20 मार्च के फैसले को न्यायोचित ठहराते हुये कहा कि अनुसूचित जाति - जनजाति कानून पर अपनी व्यवस्था के बारे में निर्णय करते समय शीर्ष अदालत ने किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सभी पहलुओं और फैसलों पर विचार किया था. 


पीठ ने कहा कि वह सौ फीसदी इन समुदायों के अधिकारों की रक्षा करने और उनपर अत्याचार के दोषी व्यक्तियों को दंडित करने के पक्ष में है. केन्द्र ने अनुसूचित जाति - जनजाति ( अत्याचारों की रोकथाम ) कानून , 1989 के तहत तत्काल गिरफ्तारी के प्रावधानों में कुछ सुरक्षात्मक उपाय करने के शीर्ष अदालत के 20 मार्च के फैसले पर पुनर्विचार के लिये दो अप्रैल को न्यायालय में याचिका दायर की थी. 


शीर्ष अदालत ने 27 अप्रैल को केन्द्र की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करने का निश्चय किया था परंतु उसने स्पष्ट कर दिया था कि वह इस मामले में और किसी याचिका पर विचार नहीं करेगी. यही नहीं , न्यायालय ने केन्द्र की पुनर्विचार याचिका पर फैसला होने तक 20 मार्च के अपने निर्णय को स्थगित रखने से इंकार कर दिया था. इस फैसले के बाद अनुसूचित जाति और जनजातियों के अनेक संगठनों ने देश में दो अप्रैल को भारत बंद का आयोजन किया था जिसमें आठ व्यक्तियों की जान चली गयी थी. 


(इनपुट भाषा से)




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एससी-एसटी एक्ट: फैसले पर रोक से कोर्ट का इनकार, कहा- हम अधिकारों की रक्षा के पक्ष में

एससी-एसटी एक्ट: फैसले पर रोक से कोर्ट का इनकार, कहा- हम अधिकारों की रक्षा के
पक्ष में
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नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की उस याचिका को ठुकरा दिया, जिसमें एससी-एसटी एक्ट पर दिए फैसले पर रोक लगाने की मांग की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम 100 फीसदी पिछड़े समुदायों के अधिकारों की रक्षा के पक्ष में हैं। अदालत ने केंद्र के उस दावे से भी पूरी तरह अहसमति जताई, जिसमें कहा गया था कि फैसले की वजह से राज्यों में हुई हिंसा में लोगों की जान गई। मामले की अगली सुनवाई 16 मई को होगी। बता दें कि इससे पहले हुई सुनवाई में भी केंद्र ने कहा था कि फैसले से कानून के प्रावधान कमजोर हुए हैं।


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ट्रिपल तलाक को लेकर बड़ा कदम उठाने जा रही है सरकार, अगली कैबिनेट बैठक में हो सकता है फैसला

ट्रिपल तलाक को लेकर बड़ा कदम उठाने जा रही है सरकार, अगली कैबिनेट बैठक में हो सकता
है फैसला
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नई दिल्लीः संसद में ट्रिपल तलाक बिल के अटकने के लेकर केंद्र की मोदी सरकार बड़ा फैसला करने जा रही है. ऐसी खबर है कि सरकार ट्रिपल तलाक पर अध्यादेश ला सकती है और सरकार ने इसके लिए पूरी तैयारी भी कर ली है. सूत्रों के हवाले से खबर है कि बुधवार को हुई कैबिनेट की बैठक में ट्रिपल तलाक को लेकर चर्चा की गई थी. आपको बता दें कि ट्रिपल तलाक बिल राज्यसभा में अटका हुआ है. यह बिल लोकसभा में पारित किया जा चुका है. मुस्लिम समाज में ट्रिपल तलाक की प्रथा को सुप्रीम कोर्ट ने भी असंवैधानिक करार दिया है. कोर्ट के फैसले और केंद्र सरकार द्वारा इस बिल को संसद में लाने का मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया था.


बुधवार को हुई कैबिनेट की बैठक के बाद ऐसा माना जा रहा है कि कैबिनेट की अगली बैठक में ट्रिपल तलाक को लेकर सरकार अध्यादेश ला सकती है. ऐसी खबर है कि इस अध्यादेश में वही प्रावधान होंगे जो कि प्रस्तावित कानून और लोकसभा से पास हो चुके विधेयक में हैं.


शाही इमाम ने AIMPLB को निशाने पर लिया
दिल्ली में 4 अप्रैल को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रदर्शन के विरोध में दिल्ली के शाही इमाम, मौलाना सैयद अहमद बुखारी ने कहा था कि लॉ बोर्ड अपना जुर्म छिपाने के लिए मुस्लिम महिलाओं का गलत इस्तेमाल कर रहा है. महिलाओं के प्रदर्शन को लेकर उन्होंने कहा कि इससे नई बिद्दत का जन्म हो रहा है. शाही इमाम के इस बयान को लेकर देवबंदी उलेमाओं ने कहा कि यह जगजाहिर है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और शाही इमाम के आपसी ताल्लुक ठीक नहीं है. महिलाओं के प्रदर्शन का सुन्नत और बिद्दत से कोई लेना-देना नहीं है. देवबंदी उलेमाओं ने कहा कि इस तरह मुस्लिम महिलाओं का सड़कों पर उतरना इस्लामिक इतिहास में अब तक नहीं हुआ है.


सरकार पर शरियत में हस्तक्षेत्र का आरोप
बता दें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार तलाक-ए-बिद्दत को लेकर कानून लेकर आ रही है. ट्रिपल तलाक विधेयक को लोकसभा से मंजूरी भी मिल चुकी है. हालांकि, अभी तक इसे उच्च सदन (राज्यसभा) से मंजूरी नहीं मिली है. इस कानून को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का आरोप है कि सरकार कानून के नाम पर शरियत में हस्तक्षेप कर रही है. पर्सनल लॉ बोर्ड का यह भी आरोप है कि सरकार का मकसद कॉमन सिविल कोड थोपने की है, तीन तलाक पर कानून तो महज दिखावा है. तमाम विपक्षी दल भी तीन तलाक पर कानून के विरोध में है.


सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत को माना अपराध
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत, मतलब एक साथ तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में रखा है. कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को गैर कानूनी माना और कानून बनाने की अपील की. तीन तलाक को लेकर जिस विधेयक को लोकसभा से मंजूरी मिली है, उसके मुताबिक एक बार में तीन तलाक देना गैर-कानूनी और अमान्य होगा. आरोप साबित होने के बाद पति को तीन साल तक की सजा हो सकती है. इसके अलावा तलाक-ए-बिद्दत को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है. 




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World Press Freedom Day: Know How Many Journalist Lost Their Lives In India - World Press Freedom Day: विश्व रैंकिंग में फिसला भारत, 7 सालों में इतने पत्रकारों ने गंवाई जान

World Press Freedom Day: Know How Many Journalist Lost Their Lives In
India - World Press Freedom Day: विश्व रैंकिंग में फिसला भारत, 7 सालों में इतने
पत्रकारों ने गंवाई जान
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वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम डे पूरी दुनिया में आज मनाया जा रहा है। दुनियाभर की नामचीन हस्तियां इस मौके पर पत्रकारों को बधाई दे रही हैं। वैश्विक संगठन यूनेस्को ने ट्वीट कर लिखा- पत्रकारिता कोई अपराध नहीं है। बिना सुरक्षित पत्रकारिता के सुरक्षित सूचना हो नहीं सकती। बिना सूचना के कोई आजादी नहीं होती। आज और रोजाना प्रेस की आजादी के लिए खड़े हों। 


भारत में पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माना जाता है। मगर हमारे देश में पत्रकारों की स्थिति पिछले कुछ सालों के दौरान बदतर हुई है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स की 180 मजबूत देशों की सूची में भारत तीन पायदान फिसलकर 136वें नंबर पर आ गया है। इससे पहले भारत 133वें स्थान पर था। इस सूची में पहले नंबर पर जहां नॉर्वे है, वहीं दक्षिण कोरिया सबसे नीचे पायदान पर मौजूद है। पूरी दुनिया में इस समय 193 पत्रकार जेल में हैं। 

भारत के पिछले सात सालों के आंकड़ों पर नजर डालें तो परिस्थिति चिंताजनक बनी हुई है। साल 2012 में 74, 2013 में 73, 2014 में 61, 2015 में 73, 2016 में 48, 2017 में 46 और साल 2018 में अब तक 14 पत्रकारों ने काम के दौरान अपनी जान गंवाई है। यानी सात सालों में 389 पत्रकारों की जान केवल भारत में गई है।

दुनिया पत्रकारों के लिए नर्क वाली जगह बन चुकी है। वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 21 देशों को काले रंग में दिखाया गया है। जिसका मतलब है कि इन देशों में प्रेस की आजादी बहुत खराब है। वही 51 देशों को खराब स्थिति वाले वर्ग में रखा गया है। 

इंडियन नेशनल कांग्रेस ने पत्रकारों को प्रेस फ्रीडम की बधाई देते हुए लिखा है- आज भारतीय पत्रकारों के लिए कठिन समय है। ईमानदार और संतुलित आवाजों को झूठ से दबा दिया जाता है। यह बहुत जरूरी है कि हमारे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को मजबूत बनाया जाए और इसे और निडर बनाने के लिए योगदान दिया जाए।

केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी पत्रकारों को सूचना का महत्वपूर्ण जरिया बताया है। उन्होंने लिखा- मुक्त और ईमानदार प्रेस लोकतंत्र के रीढ़ है। प्रेस हमेशा से दुनिया भर में सूचना, आलोचना और संचार का एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। इसलिए प्रेस की स्वतंत्रता आवश्यक है। 
 





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Wednesday, 2 May 2018

जस्टिस जोसेफ मामले में सरकार की सफाई, नाम वापसी का उत्तराखंड फैसले से कोई संबंध नहीं

जस्टिस जोसेफ मामले में सरकार की सफाई, नाम वापसी का उत्तराखंड फैसले से कोई संबंध नहीं
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नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के जस्टिस केएम जोसेफ की पदोन्नति की सिफारिश थी, लेकिन केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की इस सिफारिश को ठुकरा दिया था. इस पर सरकार ने सफाई दी है कि सिफारिश ठुकराने के पीछे उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन का मामला कतई नहीं है. सरकार ने बुधवार को इस बात को खारिज कर दिया कि उत्तराखंड के मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ की सुप्रीम में नियुक्ति के प्रस्ताव को उसने इसलिए ठुकरा दिया कि उन्होंने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के फैसले को पलट दिया था.


कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के तीन फैसलों से सरकार को यह अधिकार प्राप्त है कि वह न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा भेजे गए प्रस्तावों पर पुनर्विचार करने के लिए कह सकती है. प्रसाद ने कहा कि वह पूरे अधिकार के साथ इस बात से इनकार करते हैं कि इसका उससे कोई लेना-देना है. उन्होंने कहा कि अपने रूख का समर्थन करने के लिए उनके पास दो स्पष्ट कारण हैं.


यह भी पढ़ें- जस्टिस जोसेफ की पदोन्नति पर फैसला टला, कॉलेजियम की बैठक रही बेनतीजा


कानून मंत्री ने कहा कि उत्तराखंड में तीनचौथाई बहुमत के साथ सरकार चुनी गई है. दूसरा, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने उस आदेश (न्यायमूर्ति जोसेफ) की पुष्टि की थी. न्यायमूर्ति खेहर ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को भी खारिज कर दिया था. इसके बाद भी वह राजग सरकार के कार्यकाल में प्रधान न्यायाधीश बने. 
प्रसाद ने न्यायपालिका के संबंध में पूर्व प्रधान न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया देने से इंकार कर दिया और कहा वह सेवानिवृत्त न्यायाधीश के बयान पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहेंगे. 


सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति जोसेफ की नियुक्ति को रोकने के फैसले के बारे में पूछे गए सवालों के जवाब में प्रसाद ने कहा कि सरकार के खिलाफ प्रायोजित आरोप लगाए जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि आमतौर पर और विशेष रूप से कांग्रेस द्वारा सरकार के खिलाफ आरोप लगाए जा रहे हैं कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन संबंधी उनके फैसले को लेकर उनकी नियुक्ति को रोका गया.


बता दें कि सरकार ने 26 अप्रैल को उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम से कहा था कि वह न्यायमूर्ति जोसेफ के संबंध में अपनी सिफारिश पर पुनर्विचार करे. 




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