Friday, 4 May 2018

Allahabad High Court Challenges Its Own Decision In The Supreme Court - इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने ही फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती

Allahabad High Court Challenges Its Own Decision In The Supreme Court -
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने ही फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी चुनौती
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हाईकोर्ट के पारिवारिक अदालतों की देखरेख के सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट अपने ही फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। उसकी अपील पर जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर भानुमति की पीठ ने प्रतिवादी और उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब देने को कहा है। हाईकोर्ट की ओर से जगजीत सिंह छाबड़ा और यशवर्धन मामले की पैरवी कर रहे हैं।
 
इस मामले में मुख्य मुद्दा उत्तर प्रदेश में पारिवारिक अदालतों की देखरेख की जिम्मेदारी हाईकोर्ट को दिए जाने के विरोधाभाषी नियमों को लेकर है। राज्य सरकार द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 1995 के नियम 36 कहता है कि सभी पारिवारिक अदालतें हाईकोर्ट की देखरेख में काम करेंगी। 

हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 2006 के नियम 58 के अनुसार पारिवारिक अदालत के जज जिला जज की प्रशासनिक एवं अनुशासनात्मक देखरेख के तहत आएंगे। अलबत्ता, इन पर हाईकोर्ट का पूर्ण नियंत्रण होगा।

उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन ने नियम 58 को खत्म करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने इसके 1995 की नियमावली के नियम 26 के विरोधाभाषी होने और संविधान के अनुच्छेद 235 का उल्लंघन करने की दलील दी थी। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए मामले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक इकाई के पास भेजने का निर्देश दिया था। ताकि नियम 58 के लिए उपयुक्त संशोधन किया जा सके और पारिवारिक अदालतों को प्रभावी तरीके से हाईकोर्ट की देखरेख में लाया जा सके। इसी फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।

याचिकाकर्ता की दलील -
1- हाईकोर्ट का उत्प्रेषण आज्ञापत्र जारी करना और उसी अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पेश करने को कहना न्यायिक अधिकारों के दायरे से आगे जाना है। हाईकोर्ट सिर्फ निचली अदालतों के खिलाफ ही उतप्रेषण आज्ञापत्र जारी कर सकता है, न कि अपने खिलाफ। ऐसा करके हाईकोर्ट ने अपने अधिकारक्षेत्र को लांघा है और यह फैसला कानूनन सही नहीं है। 
2- पारिवारिक अदालत अधिनियम, 1984 के अनुसार, पारिवारिक अदालत के कामकाज के लिए नियम बनाने का अधिकार भले ही राज्य सरकार के साथ-साथ हाईकोर्ट को हो लेकिन नियुक्तियों आदि के मामले में अंतिम फैसला हाईकोर्ट का ही होता है। ऐसा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए किया गया है।
3- उत्तर प्रदेश की वित्तीय स्थिति को देखते हुए यह संभव नहीं है कि जिला जज के पद वाले उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी को पारिवारिक अदालत का मुख्य जज बनाया जाए। 



हाईकोर्ट के पारिवारिक अदालतों की देखरेख के सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट अपने ही फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। उसकी अपील पर जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस आर भानुमति की पीठ ने प्रतिवादी और उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब देने को कहा है। हाईकोर्ट की ओर से जगजीत सिंह छाबड़ा और यशवर्धन मामले की पैरवी कर रहे हैं।


 
इस मामले में मुख्य मुद्दा उत्तर प्रदेश में पारिवारिक अदालतों की देखरेख की जिम्मेदारी हाईकोर्ट को दिए जाने के विरोधाभाषी नियमों को लेकर है। राज्य सरकार द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 1995 के नियम 36 कहता है कि सभी पारिवारिक अदालतें हाईकोर्ट की देखरेख में काम करेंगी। 

हालांकि, हाईकोर्ट द्वारा पास उत्तर प्रदेश पारिवारिक अदालत नियम, 2006 के नियम 58 के अनुसार पारिवारिक अदालत के जज जिला जज की प्रशासनिक एवं अनुशासनात्मक देखरेख के तहत आएंगे। अलबत्ता, इन पर हाईकोर्ट का पूर्ण नियंत्रण होगा।

उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा एसोसिएशन ने नियम 58 को खत्म करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उसने इसके 1995 की नियमावली के नियम 26 के विरोधाभाषी होने और संविधान के अनुच्छेद 235 का उल्लंघन करने की दलील दी थी। इस पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में फैसला देते हुए मामले को हाईकोर्ट की प्रशासनिक इकाई के पास भेजने का निर्देश दिया था। ताकि नियम 58 के लिए उपयुक्त संशोधन किया जा सके और पारिवारिक अदालतों को प्रभावी तरीके से हाईकोर्ट की देखरेख में लाया जा सके। इसी फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।

याचिकाकर्ता की दलील -
1- हाईकोर्ट का उत्प्रेषण आज्ञापत्र जारी करना और उसी अदालत के समक्ष रिकॉर्ड पेश करने को कहना न्यायिक अधिकारों के दायरे से आगे जाना है। हाईकोर्ट सिर्फ निचली अदालतों के खिलाफ ही उतप्रेषण आज्ञापत्र जारी कर सकता है, न कि अपने खिलाफ। ऐसा करके हाईकोर्ट ने अपने अधिकारक्षेत्र को लांघा है और यह फैसला कानूनन सही नहीं है। 
2- पारिवारिक अदालत अधिनियम, 1984 के अनुसार, पारिवारिक अदालत के कामकाज के लिए नियम बनाने का अधिकार भले ही राज्य सरकार के साथ-साथ हाईकोर्ट को हो लेकिन नियुक्तियों आदि के मामले में अंतिम फैसला हाईकोर्ट का ही होता है। ऐसा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए किया गया है।
3- उत्तर प्रदेश की वित्तीय स्थिति को देखते हुए यह संभव नहीं है कि जिला जज के पद वाले उच्च न्यायिक सेवा के अधिकारी को पारिवारिक अदालत का मुख्य जज बनाया जाए। 





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Judiciary-Executive showdown in Supreme court । जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सामने आया केंद्र और न्यायपालिका में टकराव

Judiciary-Executive showdown in Supreme court । जजों की नियुक्ति को लेकर
सुप्रीम कोर्ट में सामने आया केंद्र और न्यायपालिका में टकराव
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नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच चल रही खींचतान शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में उस समय खुल कर सामने आ गई जब केन्द्र ने उच्च न्यायालयों में रिक्त स्थानों पर नियुक्तियों के लिये थोड़े नामों की सिफारिश करने पर कोलेजियम पर सवाल उठाये. शीर्ष अदालत ने भी इसके जवाब में कोलेजियम द्वारा की गयी सिफारिशें लंबित रखने के लिये केन्द्र को आड़े हाथ लिया. न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल से कहा , ‘‘ हमें बतायें , कितने नाम ( कोलेजियम द्वारा की गयी सिफारिशें ) आपके पास लंबित हैं. ’’ अटार्नी जनरल ने जब यह कहा , ‘‘ मुझे इसकी जानकारी हासिल करनी होगी ’’ तो पीठ ने व्यंग्य करते हुये कहा , ‘‘ जब यह सरकार पर आता है तो आप कहते हैं कि हम मालूम करेंगे. ’’


पीठ ने यह तल्ख टिप्पणी उस वक्त की जब वेणुगोपाल ने कहा कि यद्यपि न्यायालय मणिपुर , मेघालय और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त स्थानों के मामले की सुनवाई कर रही है , लेकिन तथ्य तो यह है कि जिन उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 40 पद रिक्त हैं , वहां भी कोलेजियम सिर्फ तीन नामों की ही सिफारिश की रही है. 


अटार्नी जनरल ने कहा , ‘‘ कोलेजियम को व्यापक तस्वीर देखनी होगी और ज्यादा नामों की सिफारिश करनी होगी. कुछ उच्च न्यायालयों में 40 रिक्तियां हैं और कोलेजियम ने सिर्फ तीन नामों की ही सिफारिश की है. और सरकार के बारे में कहा जा रहा है कि हम रिक्तयों को भरने में सुस्त हैं. ’’ वेणुगोपाल ने कहा , ‘‘ यदि कोलेजियम की सिफारिश ही नहीं होगी तो कुछ भी नहीं किया जा सकता है. ’’ पीठ ने इस पर अटार्नी जनरल को याद दिलाया कि सरकार को नियुक्तियां करनी हैं. 


कोलेजियम ने 19 अप्रैल को न्यायमूर्ति एम याकूब मीर और न्यायमूर्ति रामलिंगम सुधाकर को मेघालय उच्च न्यायालय और मणिपुर उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की थी जिन्हें अभी तक मंजूरी नहीं मिली है. इस मामले की सुनवाई के दौरान वेणुगोपाल ने कहा कि न्यायमूर्ति सुधाकर और न्यायमूर्ति याकूब मीर के नामों पर विचार किया जायेगा और इनके आदेश ‘ जल्द ही जारी हो जायेंगे. 


पीठ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा , ‘‘ जल्दी का मतलब क्या ? जल्दी तो तीन महीने हो सकते हैं. ’’ शीर्ष अदालत ने 17 अप्रैल को एक व्यक्ति की याचिका मणिपुर उच्च न्यायालय से गुजरात उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने के लिये दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान इस तथ्य का संज्ञान लिया था कि न्यायाधीशों के पद रिक्त होने की वजह से मणिपुर , मेघालय और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में स्थिति ‘ गंभीर ’ है. 


न्यायालय ने इस तथ्य को भी नोट किया था कि मणिपुर उच्च न्यायालय के लिये सात न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं लेकिन वहां सिर्फ दो ही न्यायाधीश हैं. इसी प्रकार मेघालय उच्च न्यायालय में चार न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं परंतु वहां इस समए एक और त्रिपुरा में चार पदों की तुलना में दो ही न्यायाधीश हैं. शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि केन्द्र ने कोलेजियम की सिफारिश के तीन महीने से भी अधिक समय बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ को पदोन्न करके शीर्ष अदालत का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश लौटा दी थी . 


अटार्नी जनरल ने बहस के दौरान मेघालय उच्च न्यायलाय के अतिरिक्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति सोंगखुपचुंग सर्तो को स्थाई न्यायाधीश बनाने से संबंधित कोलेजियम की छह मार्च के प्रस्ताव का भी जिक्र किया. न्यायमूर्ति सर्तो गौहाटी उच्च न्यायालय में तबादले पर काम कर रहे थे. इस प्रस्ताव में कोलेजियम ने न्यायमूर्ति सर्तो को मणिपुर उच्च न्यायालय का स्थाई न्यायाधीश बनाने की सिफारिश करते हुये कहा था कि वह गौहाटी उच्च न्यायालय में ही काम करते रहेंगे. 


यह भी पढ़ेंः जस्टिस जोसेफ मामले में सरकार की सफाई, नाम वापसी का उत्तराखंड फैसले से कोई संबंध नहीं


वेणुगोपाल ने इस प्रस्ताव का जिक्र करते हुये कहा कि यह बहुत ही विचित्र है कि न्यायमूर्ति सर्तो को गौहाटी उच्च न्यायालय में ही काम करने देना चाहिए. इस पर पीठ ने टिप्पणी की , ‘‘ हो सकता है कि कोलेजियम उन्हें वापस मणिपुर लाना नहीं चाहती हो. हमें नहीं पाता. ’’ न्यायालय ने तब अटार्नी जनरल से कहा कि यह सिर्फ मणिपुर उच्च न्यायालय में समस्या नहीं है. मेघालय और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में भी ऐसे ही हालात हैं. 


वेणुगोपाल ने कहा कि उन्होंने मणिपुर उच्च न्यायालय के बारे में पता किया था और एक बार न्यायमूर्ति सुधाकर वहां जायेंगे तो न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर तीन हो जायेगी और समस्या हल हो जायेगी. पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा कि मेघालय , मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों के बारे में दस दिन के भीतर हलफनामा दाखिल किया जाये.




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Supreme Court reserves order on review plea by 2 death row convicts in Nirbhaya gangrape and murder case

Supreme Court reserves order on review plea by 2 death row convicts in
Nirbhaya gangrape and murder case
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इस मामले में दोषी विनय शर्मा और पवन गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट से उनकी मौत की सजा बरकरार रखने संबंधी मई 2017 के फैसले पर पुनर्विचार का अनुरोध किया है.





निर्भया केस: दो दोषियों की पुनर्विचार याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी

(फाइल फोटो)







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New Zealand Court Names Envoy Charged With Hiding Camera in Embassy Bathroom

New Zealand Court Names Envoy Charged With Hiding Camera in Embassy
Bathroom
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It had likely been in place for months, the authorities said, judging by a thick layer of dust on the platform where it was mounted.

Investigators found 19 images of people taken on the day the camera was discovered. All of the people in those photographs were clothed.



A court previously ordered that Mr. Keating’s name not be released publicly, but that decision was reversed by a High Court judge in Auckland on Friday. His lawyer argued that Mr. Keating’s name should remain secret because his daughter is serving in the navy and could face “extreme hardship” if he were named, Radio New Zealand reported.

Mr. Keating’s lawyer said that the case will hinge on determining who placed the camera in the bathroom.

The prosecution claims Mr. Keating’s DNA was discovered on the camera’s memory card, according to Radio New Zealand.

Mr. Keating, who retired his post, is awaiting trial while on bail. He has pleaded not guilty to the charge and is next due in court in July.

In March, New Zealand’s second-ranking envoy to the United States was censured by the Foreign Ministry after she - that the Democratic Party needed to get its act together “or we will all die.”

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Thursday, 3 May 2018

On Live streaming of court proceedings Supreme Court seeks Centre reply within four weeks

On Live streaming of court proceedings Supreme Court seeks Centre reply
within four weeks
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Publish Date:Fri, 04 May 2018 10:50 AM (IST)



नई दिल्ली (प्रेट्र)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालती सुनवाई के सजीव (LIVE) प्रसारण पर चार सप्ताह में केंद्र जवाब दाखिल करे। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की बेंच ने यह फैसला इंदिरा जयसिंह की याचिका पर लिया, लेकिन इसी मसले पर दाखिल एक अन्य वकील मुंबई के मैथ्यूज नेदमपाड़ा की याचिका को खारिज कर दिया।


चीफ जस्टिस के साथ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, एएम खानविलकर ने नेदमपाड़ा को कड़ी फटकार भी लगाई। बेंच का कहना था कि आप बॉम्बे हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ ऐसे आरोप लगा भी कैसे सकते हैं। नेदमपाड़ा ने सोशल मीडिया पर चल रहे उस अभियान का हवाला दिया जिसमें न्यायपालिका में पारदर्शिता की बात की जा रही है।


जस्टिस चंद्रचूड़ का कहना था कि उन्हें वाट्स एप पर चल रहे संदेश से पता चला है कि उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट के जज को एक मामले में पार्टी बना रखा है। उनका सवाल था कि नेदमपाड़ा ऐसा कैसे कर सकते हैं। यह अदालत की अवमानना है। जयसिंह की याचिका पर कोर्ट ने केंद्र से कहा कि चार सप्ताह में जवाब दाखिल करें। इस मामले में अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल को एमीकस क्यूरी बनाया गया है। नेदमपाड़ा मामले में उनका तर्क था कि अगर याचिकाकर्ता पाक साफ है तो उसे अपील वापस लेकर नई दरखास्त लगानी चाहिए। इंदिरा जयसिंह ने अपनी याचिका में राष्ट्रीय व संवैधानिक हित के मसलों में अदालती सुनवाई का सजीव प्रसारण करने की मांग की है। कनाडा व अंतराष्ट्रीय न्यायालय का हवाला देते हुए उनका कहना था कि वहां के कोर्ट की सुनवाई यू- ट्यूब पर उपलब्ध हैं।



By Nancy Bajpai




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Wednesday, 2 May 2018

Assistant town planner in her last hours, said: ‘We are only following court orders’

Assistant town planner in her last hours, said: ‘We are only following
court orders’
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मेरठ में आग का तांडव, कई झुग्गियां जलकर खाक, कई घंटों के बाद आग पर पाया काबू





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Supreme Court Collegium Decision On Justice K.m. Joseph On Hold - जस्टिस जोसेफ के मामले पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक बेनतीजा

Supreme Court Collegium Decision On Justice K.m. Joseph On Hold - जस्टिस
जोसेफ के मामले पर सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक बेनतीजा
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ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Thu, 03 May 2018 02:42 AM IST





Supreme Court collegium decision on Justice K.M. Joseph on hold






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उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जज नियुक्त करने की फाइल सरकार के पास दोबारा भेजने को लेकर कॉलेजियम बुधवार को अंतिम निर्णय नहीं ले सका। 


हालांकि इस बैठक से लगभग साफ हो गया है कि अगली बार जब भी कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति की सिफारिश सरकार को भेजेगा, उसमें जस्टिस जोसेफ के नाम के साथ कुछ और जजों के नाम भी होंगे।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की कॉलेजियम बैठक करीब 35 मिनट चली। चूंकि बुधवार को दूसरे वरिष्ठतम जज जस्टिस जे चेलमेश्वर छुट्टी पर थे, इसलिए कयास लगाया जा रहा था कि बैठक न हो। लेकिन करीब सवा चार बजे वह सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और कॉलेजियम की बैठक में हिस्सा लिया।

कॉलेजियम के समक्ष दो मुद्दे थे। पहला, जस्टिस जोसेफ का नाम दोबारा भेजा जाए या नहीं और दूसरा, कलकत्ता, राजस्थान और तेलंगाना एवं आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के जजों को सुप्रीम कोर्ट भेजने के मसले पर विचार। फिलहाल, कॉलेजियम की अगली बैठक को लेकर कोई तारीख तय नहीं की गई है।





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Tuesday, 1 May 2018

Oath A Must For Trust Vote, Matter Reached Supreme Court - पंचायत चुनाव में शपथ न लेने का मुद्दा पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

Oath A Must For Trust Vote, Matter Reached Supreme Court - पंचायत चुनाव में
शपथ न लेने का मुद्दा पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Tue, 01 May 2018 12:13 PM IST



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सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ में निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ली जाने वाली शपथ का मुद्दा पहुंचा है लेकिन इस मुद्दे पर जजों के बीच मतभेद है कि एक चुना हुआ सदस्य बिना शपथ लिए अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर सकता है या नहीं। 

दरअसल मामला उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायत से जुड़ा हुआ है। यहां सरपंच के चुनाव के एक साल बाद बाकी सदस्यों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। इस मामले में आरोप लगाया गया था कि जो सदस्य अविश्वास प्रस्ताव लाये थे उनमें से 13 लोगों ने पंचायत सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली थी लेकिन उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिये। इसके बाद अदालत में याचिका दायर कर पूछा गया कि जिन लोगों ने पंचायत सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली क्या वो अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर सकते हैं और क्या वो वैद्य सदस्य हैं। 

जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता के बीच इस मामले में अलग राय है। जस्टिस लोकुर ने इस मामले में 34 साल पुराने 1984 के मामले का हवाला दिया जिसमें एक MLA जिसने शपथ नहीं ली थी और उसने एक शख्स का नाम राज्यसभा के लिए प्रस्तावित किया था। इस मामले में एससी ने कहा था कि अगर चुनाव आयोग एक बार किसी शख्स के निर्वाचित होने का नोटीफिकेशन जारी कर देती है तो वह राज्यसभा में जाने के लिए किसी शख्स का प्रस्तावक बन सकता है। इसी तरह गांव के सरपंच के खिलाफ लाये गए अविश्वास प्रस्ताव में जिन लोगों ने बिना शपथ लिए हस्ताक्षर किये हैं, उनको यह करने का पूरा अधिकार है। 

 वहीं जस्टिस गुप्ता का कहना है कि जस्टिस लोकुर द्वारा दिया गया तर्क सही नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर कोई सदस्य शपथ नहीं लेता तो फिर क्या महत्व है इसका? शपथ न लेने से वह सदस्य बनना बंद नहीं हो जाते लेकिन वह सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले सकते। इसलिए पंचायत चुनाव मामले में जिन लोगों ने शपथ नहीं ली है वह अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं रखते। 

हालांकि जस्टिस लोकुर और गुप्ता ने कहा कि विधानमंडल को यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि पंचायत सदस्य निश्चित समय में शपथ जरूर लें। 



सुप्रीम कोर्ट की एक खंडपीठ में निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा ली जाने वाली शपथ का मुद्दा पहुंचा है लेकिन इस मुद्दे पर जजों के बीच मतभेद है कि एक चुना हुआ सदस्य बिना शपथ लिए अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर सकता है या नहीं। 


दरअसल मामला उत्तर प्रदेश की ग्राम पंचायत से जुड़ा हुआ है। यहां सरपंच के चुनाव के एक साल बाद बाकी सदस्यों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। इस मामले में आरोप लगाया गया था कि जो सदस्य अविश्वास प्रस्ताव लाये थे उनमें से 13 लोगों ने पंचायत सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली थी लेकिन उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिये। इसके बाद अदालत में याचिका दायर कर पूछा गया कि जिन लोगों ने पंचायत सदस्य के रूप में शपथ नहीं ली क्या वो अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर सकते हैं और क्या वो वैद्य सदस्य हैं। 

जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता के बीच इस मामले में अलग राय है। जस्टिस लोकुर ने इस मामले में 34 साल पुराने 1984 के मामले का हवाला दिया जिसमें एक MLA जिसने शपथ नहीं ली थी और उसने एक शख्स का नाम राज्यसभा के लिए प्रस्तावित किया था। इस मामले में एससी ने कहा था कि अगर चुनाव आयोग एक बार किसी शख्स के निर्वाचित होने का नोटीफिकेशन जारी कर देती है तो वह राज्यसभा में जाने के लिए किसी शख्स का प्रस्तावक बन सकता है। इसी तरह गांव के सरपंच के खिलाफ लाये गए अविश्वास प्रस्ताव में जिन लोगों ने बिना शपथ लिए हस्ताक्षर किये हैं, उनको यह करने का पूरा अधिकार है। 

 वहीं जस्टिस गुप्ता का कहना है कि जस्टिस लोकुर द्वारा दिया गया तर्क सही नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर कोई सदस्य शपथ नहीं लेता तो फिर क्या महत्व है इसका? शपथ न लेने से वह सदस्य बनना बंद नहीं हो जाते लेकिन वह सदन की कार्यवाही में हिस्सा नहीं ले सकते। इसलिए पंचायत चुनाव मामले में जिन लोगों ने शपथ नहीं ली है वह अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं रखते। 

हालांकि जस्टिस लोकुर और गुप्ता ने कहा कि विधानमंडल को यह अनिवार्य कर देना चाहिए कि पंचायत सदस्य निश्चित समय में शपथ जरूर लें। 





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