Friday, 4 May 2018

मध्यप्रदेश में जेब में प्याज लेकर क्यों घूम रहे हैं बीजेपी विधायक?

मध्यप्रदेश में जेब में प्याज लेकर क्यों घूम रहे हैं बीजेपी विधायक?
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ध्यप्रदेश में प्याज किसानों को भले ही रुलाए लेकिन बीजेपी के लिए ये सियासी दवा से कम नहीं है.





मध्यप्रदेश में जेब में प्याज लेकर क्यों घूम रहे हैं बीजेपी विधायक?

जेब में प्याज लेकर घूमने की सलाह मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दी है...(फोटो साभार: Facebook)







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Know What World Bank Report Says On Electricity Program Of India - भारत के गांवों में बिजली को लेकर वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने किया ये दावा

Know What World Bank Report Says On Electricity Program Of India - भारत
के गांवों में बिजली को लेकर वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने किया ये दावा
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Know What World Bank Report Says On Electricity Program Of India - भारत के गांवों में बिजली को लेकर वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने किया ये दावा- Amar Ujala Hindi News















































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Judiciary-Executive showdown in Supreme court । जजों की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सामने आया केंद्र और न्यायपालिका में टकराव

Judiciary-Executive showdown in Supreme court । जजों की नियुक्ति को लेकर
सुप्रीम कोर्ट में सामने आया केंद्र और न्यायपालिका में टकराव
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नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच चल रही खींचतान शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में उस समय खुल कर सामने आ गई जब केन्द्र ने उच्च न्यायालयों में रिक्त स्थानों पर नियुक्तियों के लिये थोड़े नामों की सिफारिश करने पर कोलेजियम पर सवाल उठाये. शीर्ष अदालत ने भी इसके जवाब में कोलेजियम द्वारा की गयी सिफारिशें लंबित रखने के लिये केन्द्र को आड़े हाथ लिया. न्यायमूर्ति मदन बी लोकूर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने अटार्नी जनरल के के वेणुगोपाल से कहा , ‘‘ हमें बतायें , कितने नाम ( कोलेजियम द्वारा की गयी सिफारिशें ) आपके पास लंबित हैं. ’’ अटार्नी जनरल ने जब यह कहा , ‘‘ मुझे इसकी जानकारी हासिल करनी होगी ’’ तो पीठ ने व्यंग्य करते हुये कहा , ‘‘ जब यह सरकार पर आता है तो आप कहते हैं कि हम मालूम करेंगे. ’’


पीठ ने यह तल्ख टिप्पणी उस वक्त की जब वेणुगोपाल ने कहा कि यद्यपि न्यायालय मणिपुर , मेघालय और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त स्थानों के मामले की सुनवाई कर रही है , लेकिन तथ्य तो यह है कि जिन उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 40 पद रिक्त हैं , वहां भी कोलेजियम सिर्फ तीन नामों की ही सिफारिश की रही है. 


अटार्नी जनरल ने कहा , ‘‘ कोलेजियम को व्यापक तस्वीर देखनी होगी और ज्यादा नामों की सिफारिश करनी होगी. कुछ उच्च न्यायालयों में 40 रिक्तियां हैं और कोलेजियम ने सिर्फ तीन नामों की ही सिफारिश की है. और सरकार के बारे में कहा जा रहा है कि हम रिक्तयों को भरने में सुस्त हैं. ’’ वेणुगोपाल ने कहा , ‘‘ यदि कोलेजियम की सिफारिश ही नहीं होगी तो कुछ भी नहीं किया जा सकता है. ’’ पीठ ने इस पर अटार्नी जनरल को याद दिलाया कि सरकार को नियुक्तियां करनी हैं. 


कोलेजियम ने 19 अप्रैल को न्यायमूर्ति एम याकूब मीर और न्यायमूर्ति रामलिंगम सुधाकर को मेघालय उच्च न्यायालय और मणिपुर उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की थी जिन्हें अभी तक मंजूरी नहीं मिली है. इस मामले की सुनवाई के दौरान वेणुगोपाल ने कहा कि न्यायमूर्ति सुधाकर और न्यायमूर्ति याकूब मीर के नामों पर विचार किया जायेगा और इनके आदेश ‘ जल्द ही जारी हो जायेंगे. 


पीठ ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये कहा , ‘‘ जल्दी का मतलब क्या ? जल्दी तो तीन महीने हो सकते हैं. ’’ शीर्ष अदालत ने 17 अप्रैल को एक व्यक्ति की याचिका मणिपुर उच्च न्यायालय से गुजरात उच्च न्यायालय स्थानांतरित करने के लिये दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान इस तथ्य का संज्ञान लिया था कि न्यायाधीशों के पद रिक्त होने की वजह से मणिपुर , मेघालय और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में स्थिति ‘ गंभीर ’ है. 


न्यायालय ने इस तथ्य को भी नोट किया था कि मणिपुर उच्च न्यायालय के लिये सात न्यायाधीशों के पद स्वीकृत हैं लेकिन वहां सिर्फ दो ही न्यायाधीश हैं. इसी प्रकार मेघालय उच्च न्यायालय में चार न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं परंतु वहां इस समए एक और त्रिपुरा में चार पदों की तुलना में दो ही न्यायाधीश हैं. शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि केन्द्र ने कोलेजियम की सिफारिश के तीन महीने से भी अधिक समय बाद उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ को पदोन्न करके शीर्ष अदालत का न्यायाधीश बनाने की सिफारिश लौटा दी थी . 


अटार्नी जनरल ने बहस के दौरान मेघालय उच्च न्यायलाय के अतिरिक्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति सोंगखुपचुंग सर्तो को स्थाई न्यायाधीश बनाने से संबंधित कोलेजियम की छह मार्च के प्रस्ताव का भी जिक्र किया. न्यायमूर्ति सर्तो गौहाटी उच्च न्यायालय में तबादले पर काम कर रहे थे. इस प्रस्ताव में कोलेजियम ने न्यायमूर्ति सर्तो को मणिपुर उच्च न्यायालय का स्थाई न्यायाधीश बनाने की सिफारिश करते हुये कहा था कि वह गौहाटी उच्च न्यायालय में ही काम करते रहेंगे. 


यह भी पढ़ेंः जस्टिस जोसेफ मामले में सरकार की सफाई, नाम वापसी का उत्तराखंड फैसले से कोई संबंध नहीं


वेणुगोपाल ने इस प्रस्ताव का जिक्र करते हुये कहा कि यह बहुत ही विचित्र है कि न्यायमूर्ति सर्तो को गौहाटी उच्च न्यायालय में ही काम करने देना चाहिए. इस पर पीठ ने टिप्पणी की , ‘‘ हो सकता है कि कोलेजियम उन्हें वापस मणिपुर लाना नहीं चाहती हो. हमें नहीं पाता. ’’ न्यायालय ने तब अटार्नी जनरल से कहा कि यह सिर्फ मणिपुर उच्च न्यायालय में समस्या नहीं है. मेघालय और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में भी ऐसे ही हालात हैं. 


वेणुगोपाल ने कहा कि उन्होंने मणिपुर उच्च न्यायालय के बारे में पता किया था और एक बार न्यायमूर्ति सुधाकर वहां जायेंगे तो न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर तीन हो जायेगी और समस्या हल हो जायेगी. पीठ ने अटार्नी जनरल से कहा कि मेघालय , मणिपुर और त्रिपुरा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के रिक्त पदों के बारे में दस दिन के भीतर हलफनामा दाखिल किया जाये.




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कर्नाटक: पुलकेसिन, कृष्णदेव राय से लेकर टीपू सुल्तान, जनरल करियप्पा और बसवन्‍ना तक मैदान में!

कर्नाटक: पुलकेसिन, कृष्णदेव राय से लेकर टीपू सुल्तान, जनरल करियप्पा और बसवन्‍ना तक
मैदान में!
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नई दिल्ली: कर्नाटक विधानसभा चुनाव एक मामले में देश के अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव से काफी अलग नजर आ रहा है. यहां इतिहास पुरुषों का जितनी शिद्दत और जितनी बड़ी तादाद में इस्तेमाल हो रहा है, वैसा अन्य कहीं नहीं दिखाई दिया. कर्नाटक विधानसभा चुनाव में अब तक चालुक्य सम्राट पुलकेसिन द्वितीय, सम्राट हर्षवर्धन, कृष्णदेव राय, बहमनी साम्राज्य के सुल्तान, संत कवि बसवन्ना, संत कवि तिरुवल्लुवर, टीपू सुल्तान से लेकर आजाद भारत के पहले सेना अध्यक्ष मेजर जनरल करियप्पा तक का जिक्र हो चुका है. पार्टियां अपने सुभीते के हिसाब से इतिहास की व्याख्या कर रही हैं, और इतिहास पुरुषों को एक दूसरे से लड़ा रही हैं: 


पुलकेसिन द्वितीय बनाम सम्राट हर्षवर्धन 
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया जब बदामी विधानसभा सीट से पर्चा भरने पहुंचे तो वे अपने साथ चालुक्य सम्राट पुलकेसिन द्वितीय की तस्वीर भी ले गए. दरअसल सातवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में चालुक्य साम्राज्य था. उधर उत्तर भारत में सम्राट हर्षवर्धन का राज्य था. पुलकेसिन को दक्षिणपथेश्वर और हर्ष को उत्तर पथेश्वर कहा जाता था. दोनों उपाधियों का अर्थ हुआ दक्षिण का स्वामी और उत्तर का स्वामी. उस जमाने में हर्ष ने जब दक्षिण में अपना राज्य विस्तार करने के लिए हमला किया तो पुलकेसिन ने हर्ष को हरा दिया. बाद में दोनों राजाओं के बीच हुई संधि में नर्मदा नदी को दोनों राज्यों की सीमा मान लिया गया. लेकिन सिद्दारमैया ने उस जमाने में चालुक्यों की राजधानी रही बदामी से पर्चा भरते समय कहा कि जिस तरह दक्षिण के पुलकेसिन द्वितीय ने उत्तर भारत के हर्ष वर्धन को हराया था वैसे ही कर्नाटक विधानसभा चुनाव में दक्षिण भारतीय उत्तर भारतीयों को हरा देंगे. इस तरह सिद्दरमैया ने खुद को पुलकेसिन और प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह को हर्षवद़र्धन के प्रतीक के तौर पेश कर क्षेत्रवादी भावनाएं पनमाने की कोशिश की.


कृष्णदेव राय और बहमनी साम्राज्य:
14वीं से 17वीं शताब्दी तक जब उत्तर भारत में सल्तनत काल और मुगल काल चल रहा था तब दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य की तूती बोलती थी. कृष्णदेव राय इस साम्राज्य के सबसे प्रतापी शासक हुए. उस जमाने में विजयनगर उनके साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी जिसका वर्तमान नाम थंपी है. बीजेपी नेता श्रीरामलु बराबर विजयनगर साम्राज्य का वैभव लौटाने को चुनावी मुद्दा बनाते रहे हैं. बीजेपी का इलजाम है कांग्रेस सरकार ने विजयनगर साम्राज्य की विरासत की उपेक्षा की और बहमनी सुल्तानों को ज्यादा तरजीह दी है. बीजेपी ने एक ट्वीट कर बताया कि किस तरह विजयनगर साम्राज्य की विरासत को उसने पहली बार 50 रुपये के नोट की नई सीरीज में छापा है. बीजेपी विजयनगर बनाम बहमनी साम्राज्य के बहाने हिंदू-मुस्लिम मुद्दे को गर्माने की कोशिश कर रही है.


लिंगायत के बहाने बसवन्ना का जिक्र:
12वीं सदी के कन्नड़ संत बसवन्ना को लिंगायत समुदाय का संस्थापक माना जाता है. राज्य की कांग्रेस सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म बनाने का प्रस्ताव पास कर बीजेपी के इस पारंपरिक वोट बैंक पर निशाना साधा है. बीजेपी के मुख्यमंत्री प्रत्याशी येदुरप्पा इसी समुदाय से आते हैं. हमेशा से अखंड हिंदू धर्म का समर्थन करती रही बीजेपी इस मुद्दे पर शुरू में बैकफुट पर आई, लेकिन प्रधानमंत्री ने अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान बासवेश्वरा, बसवन्ना का ही एक नाम, की मूर्ति का लोकार्पण कर पहली बार विदेश से ही किसी विधानसभा चुनाव के लिए माहौल बनाने का प्रयास किया. मजे की बात यह कि जिन संत बसवन्ना के नाम आज धर्म की सियासत हो रही है, उन्होंने अपने दौर में धर्म के पाखंड का विरोध कर वंचित तबके को सीधे ईश्वर के लिंग रूप से जोड़ने की पहल की थी.
 
टीपू सुल्तान
कर्नाटक का राजनीतिक संग्राम 7वीं सदी से शुरू होकर 18वीं सदी तक चला आता है. यहां विवाद मैसूर के टीपू सुल्तान को लेकर हो रहा है. अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ सबसे आधुनिक लड़ाई वाले भारतीय शासक और युद्ध में पहली बार रॉकेट का प्रयोग करने वाले टीपू सुल्तान को यहां हिंदू मुस्लिम के चश्मे से देखा जा रहा है. टीपू में वोट की संभावनाओं देखते हुए कांग्रेस सरकार ने दो साल पहले बड़े पैमाने पर टीपू जयंती के कार्यक्रम शुरू किए. इसके जवाब में बीजेपी ने कहा कि टीपू हिंदुओं पर जुल्म करने वाला जालिम था. पिछले साल दिसंबर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हुबली में कहा कि कांग्रेस टीपू सुल्तान की जयंती मनाती है, हनुमान जयंती नहीं मनाती. योगी ने कहा कि टीपू सुल्तान की जयंती मनाने वालों का नाम नहीं रहेगा.
 
संत तिरुवल्लुवर से लेकर जनरल करियप्पा तक : संत तिरुवल्लुवर तमिल संत हैं और पिछले एक हजार साल से ज्यादा समय से भारतीय मूल के सभी धर्म उन्हें खुद से जोड़कर बताते रहे हैं. संत तिरुवल्लुवर का तमिलनाडु बहुत मान है. कर्नाटक के बंगलौर जिले की शिवाजीनगर विधानसभा सीट पर तमिलों की अच्छी खासी आबादी है, ऐसे में दोनों पार्टियां खुद को तिरुवल्लुवर के ज्यादा करीद दिखा रही हैं.


दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में जनरल करियप्पा का जिक्र किया. जनरल करियप्पा आजाद भारत के पहले सेनाध्यक्ष थे और आजादी के तुरंत बाद कश्मीर पर हुए कबायली हमले को रोकने का काम उन्हीं के नेतृत्व में हुआ था. सेना के इस्तेमाल को लेकर जनरल करियप्पा और महात्मा गांधी में हुआ संंवाद हिंसा और अहिंसा की बहस का महत्वपूर्ण पाठ माना जाता है.




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Thursday, 3 May 2018

ट्रिपल तलाक को लेकर बड़ा कदम उठाने जा रही है सरकार, अगली कैबिनेट बैठक में हो सकता है फैसला

ट्रिपल तलाक को लेकर बड़ा कदम उठाने जा रही है सरकार, अगली कैबिनेट बैठक में हो सकता
है फैसला
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नई दिल्लीः संसद में ट्रिपल तलाक बिल के अटकने के लेकर केंद्र की मोदी सरकार बड़ा फैसला करने जा रही है. ऐसी खबर है कि सरकार ट्रिपल तलाक पर अध्यादेश ला सकती है और सरकार ने इसके लिए पूरी तैयारी भी कर ली है. सूत्रों के हवाले से खबर है कि बुधवार को हुई कैबिनेट की बैठक में ट्रिपल तलाक को लेकर चर्चा की गई थी. आपको बता दें कि ट्रिपल तलाक बिल राज्यसभा में अटका हुआ है. यह बिल लोकसभा में पारित किया जा चुका है. मुस्लिम समाज में ट्रिपल तलाक की प्रथा को सुप्रीम कोर्ट ने भी असंवैधानिक करार दिया है. कोर्ट के फैसले और केंद्र सरकार द्वारा इस बिल को संसद में लाने का मुस्लिम महिलाओं ने स्वागत किया था.


बुधवार को हुई कैबिनेट की बैठक के बाद ऐसा माना जा रहा है कि कैबिनेट की अगली बैठक में ट्रिपल तलाक को लेकर सरकार अध्यादेश ला सकती है. ऐसी खबर है कि इस अध्यादेश में वही प्रावधान होंगे जो कि प्रस्तावित कानून और लोकसभा से पास हो चुके विधेयक में हैं.


शाही इमाम ने AIMPLB को निशाने पर लिया
दिल्ली में 4 अप्रैल को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रदर्शन के विरोध में दिल्ली के शाही इमाम, मौलाना सैयद अहमद बुखारी ने कहा था कि लॉ बोर्ड अपना जुर्म छिपाने के लिए मुस्लिम महिलाओं का गलत इस्तेमाल कर रहा है. महिलाओं के प्रदर्शन को लेकर उन्होंने कहा कि इससे नई बिद्दत का जन्म हो रहा है. शाही इमाम के इस बयान को लेकर देवबंदी उलेमाओं ने कहा कि यह जगजाहिर है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और शाही इमाम के आपसी ताल्लुक ठीक नहीं है. महिलाओं के प्रदर्शन का सुन्नत और बिद्दत से कोई लेना-देना नहीं है. देवबंदी उलेमाओं ने कहा कि इस तरह मुस्लिम महिलाओं का सड़कों पर उतरना इस्लामिक इतिहास में अब तक नहीं हुआ है.


सरकार पर शरियत में हस्तक्षेत्र का आरोप
बता दें सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार तलाक-ए-बिद्दत को लेकर कानून लेकर आ रही है. ट्रिपल तलाक विधेयक को लोकसभा से मंजूरी भी मिल चुकी है. हालांकि, अभी तक इसे उच्च सदन (राज्यसभा) से मंजूरी नहीं मिली है. इस कानून को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का आरोप है कि सरकार कानून के नाम पर शरियत में हस्तक्षेप कर रही है. पर्सनल लॉ बोर्ड का यह भी आरोप है कि सरकार का मकसद कॉमन सिविल कोड थोपने की है, तीन तलाक पर कानून तो महज दिखावा है. तमाम विपक्षी दल भी तीन तलाक पर कानून के विरोध में है.


सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत को माना अपराध
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक-ए-बिद्दत, मतलब एक साथ तीन तलाक को अपराध की श्रेणी में रखा है. कोर्ट ने एक साथ तीन तलाक को गैर कानूनी माना और कानून बनाने की अपील की. तीन तलाक को लेकर जिस विधेयक को लोकसभा से मंजूरी मिली है, उसके मुताबिक एक बार में तीन तलाक देना गैर-कानूनी और अमान्य होगा. आरोप साबित होने के बाद पति को तीन साल तक की सजा हो सकती है. इसके अलावा तलाक-ए-बिद्दत को गैर जमानती अपराध की श्रेणी में रखा गया है. 




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