आज के डिजिटल जमाने में जहां फिल्में सिर्फ 5-6 महीनों में बन जाती हैं और '100 करोड़ क्लब' ही सफलता का एकमात्र पैमाना बन गया है... एक समय था जब सिनेमा को सिर्फ एक 'प्रोजेक्ट' नहीं, बल्कि एक 'जुनून' माना जाता था. के. आसिफ की मास्टरपीस, 'मुगल-ए-आजम' को बनने में 15 साल लगे, क्योंकि उस समय डायरेक्टर का मकसद सिर्फ पैसे कमाना नहीं, बल्कि इतिहास रचना था.
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OPINION: जब फिल्में केवल 'प्रोजेक्ट' नहीं, बल्कि 'जुनून' हुआ करती थी
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