Monday, 28 May 2018

संगठन | Short Story on Unity

संगठन | Short Story on Unity
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Short Story on Unity






भैया ये बात तो साफ है की अगर संघठन में रहकर कोई काम किया जाए तो उस काम के सफल होने की संभावनाए कई गुना बढ़ जाती है| इसी बात से रूबरू कराती है आपको हमारी कहानी “संगठन | Short Story on Unity” जहाँ आप संगठन और संगठन से होने वाले  के बारे में जन सकेंगे| तो लीजिये पेश है आज की हमारी कहानी……..


                              संगठन | Short Story on Unity


बात सालों पुरानी है…. मथुरा के पास एक गाँव था| उस गाँव में एक लकडहारा रहता था| लकडहारा रूज सुबह सुबह जंगल में लकड़ियाँ लेने जाता और शाम को गाँव में आकर बेच देता| एक बार जब लकडहारा सुबह सुबह जंगल की और गया तो उसे जंगल में एक गड्ढे में जंगली श्वान के बच्चे को गिरा हुआ देखा| लकडहारे ने श्वान को गड्ढे से निकला और उसका उपचार करने के लिए अपने साथ अपने घर ले आया| कुछ ही समय में श्वान का बच्चा लकडहारे के परिवार से बहुत अच्छे से घुल-मिल गया|





जब श्वान का बच्चा बड़ा हुआ तो लकडहारे ने सोचा  की “श्वान के लिए जंगल का खुला वातावरण ही अच्छा रहेगा इसलिए अब इसे जंगल में छोड़ देन चाहिए” | बस लकडहारे के सोचने भर की देर थी, अगले दिन ही लकडहारा श्वान को जंगल में छोड़ आया| श्वान जल्दी ही जंगल में दुसरे श्वानों के साथ घुलमिल गया और उनका मित्र बन गया|


कुछ दिन बाद ही लकडहारे को पता चला की जंगल में एक बाघ है जो प्रायः श्वानों का शिकार कर उन्हें खा जाता है| अब लकडहारे को अपने पाले हुए श्वान की चिंता सताने लगी| लकडहारे ने कुछ सोचविचार कर अपने श्वान को बचने के लिएय बाघ का शिकार करने का निश्चय किया| अगले दिन ही लकडहारे ने बाघ को मारने की एक योजना बनाई| उसने जंगल के बिच में एक बड़ा सा गड्ढा खोदा और सभी श्वानों को गड्ढे के पीछे खड़ा कर खुद गड्ढे के आगे खड़ा हो गया|


कुछ ही समय में बाघ श्वानो का शिकार करने श्वानों के रहने वाले इलाके की और आया| बाघ ने श्वानों को डराने के लिए उन्हें घूरकर देखा और एक लम्बी दहाड़ लगाई| श्वानों के साथ लकडहारा खड़ा था इसलिए बाघ की दहाड़ सुनकर श्वान डरे नहीं और अपनी जगह पर जैसे के तैसे खड़े रहे| तभी बाघ की नज़र लकडहारे पर पड़ी| बाघ लकडहारे को मारने के लिए जैसे ही लकडहारे की औरे झपटा, लकडहारा एक और कूद गया और बाघ सीधे लकडहारे के खोदे गए गड्ढे में जा गिरा|


बस फिर क्या था, मौका देखकर सभी श्वान बाघ पर टूट पड़े और कुछ ही देर में  शेर को मार गिरा दिया| और इस तरह जंगल के श्वान संघठन से शेर जैसे जानवर पर विजय पाने में सफल हुए|


संगठन | Short Story on Unity



पढ़ें मेहनत से पहाड़ खोदने वाले किसान की कहानी!

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Sunday, 27 May 2018

परिश्रम का महत्व | Story in Hindi Language

परिश्रम का महत्व | Story in Hindi Language
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अपनी मात्रभाषा में कहानी पढने का कुछ मज़ा ही अलग है| इसीलिए हम हमारे पाठकों के लिए हमारी वेबसाइट hindishortstories.com में हिंदी में नई-नई कहानियां लेकर आते हैं| इसी कड़ी में पेश है हमारी एक और नई कहानी “परिश्रम का महत्व | Story in Hindi Language”


              परिश्रम का महत्व | Story in Hindi Language


बात तब की है जब बीमारियाँ एक पहाड़ पर रहा करती थी| पहाड़ बिमारियों को अपनी बेटी की तरह पालता पोसता था| बीमारियाँ पहाड़ के इस उपकार के लिए पहाड़ का अहसान मानती और हमेशा पहाड़ के इस अहसान के लिए किसी भी उपकार के लिए इच्छुक रहती| लेकिन पहाड़ तो पहाड़ ठहरा, था ही इतना विशाल और अपनी जगह डटा हुआ की उसे कभी बिमारियों के किसी उपकार की ज़रूरत ही नहीं पड़ी|





पहाड़ की तलहटी में ही एक गाँव था| कुछ दिन बीते और गाँव के एक किसान को खेती के लिए अतिरिक्त ज़मीन कि ज़रूरत पड़ी| किसान को कहीं ज़मीन दिखाई नहीं दी| अचानक किसान की नज़र हजारों एकड़ जमीन दबाए हुए पहाड़ पर पड़ी| किसान ने सोचा क्यों ना पहाड़ को खोदकर खेती योग्य जमीन को निकाल दिया जाए| ]


बस फिर क्या था, किसान के सोचने भर की देर थी और उसने पहाड़ को खोदकर कई साडी जमीन निकाल ली| किसान को पहाड़ खोदता देख और दुसरे किसान भी जमीन के लिए पहाड़ को खोदने चले आए| देखते ही देखते किसानों की संख्या सेकड़ों तक पहुँच गई| किसान फावड़ा लेकर पहाड़ को खोदने में जुटे रहे|


परिश्रम का महत्व | Story in Hindi Language


यह देख पहाड़ को अपना अस्तित्व खतरे में नज़र आने लगा| पहाड़ घबराया और अपने बचाव के उपाय खोजने लगा| किसान को जब अपने बचाव का कोई उपाय न सुझा तो उसे अपने कोटर में पल रही बिमारियों की याद आई| पहाड़ ने सभी बिमारियों को इकठ्ठा किया और कहा, “मेने कई साल तुम्हारी रक्षा की है और तुम्हें रहने के लिए अपनी कोटर में स्थान दिया है| लेकिन अब मेरे किए गए इस उपकार का वक्त आ गया है|” बीमारियाँ पहाड़ के किसी भी काम के लिए पहले ही तैयार थी| किसान ने फावड़े और कुदाल चलाते हुए किसानो की और इशारा किया और कहा, “पुत्रियों! यह देखो मेरे क्षत्रु| फावड़ा और कुदाल लेकर मेरे अस्तित्व को खतरे में डाले हुए हैं| तुम सब की सब इनपर झपट पदों और मेरा नाश करने वालों का सत्यानाश कर डालो|”


पहाड़ का आदेश मानकर बीमारियाँ आगे बढ़ी और किसानों के शरीर से जाकर लिपट गई| पर किसान तो अपनी धुन में लगे थे| जितने तेजी से फावड़े और कुदाल चलाते उतनी ही तेजी से पसीना बाहर निकलता और साड़ी बीमारियाँ धुलकर निचे गिर जाती| बिमारियों ने किसानों को बीमार बनाने के लिए बहुत प्रयत्न किये लेकिन बिमारियों की एक ना चली| एक अच्छा स्थान छोड़कर उन्हें गंदे स्थान पर जाना पड़ा सो अलग|


पहाड़ ने देखा की जिन बिमारियों को उसने सालों से पाला था वह भी उसकी रक्षा न कर सकी तो पहाड़ बहुत क्रोधित हुआ और उसने बिमारियों को श्राप दिया, कि “मेने तुम्हें अपनी पुत्रियों कि तरह पाला पर फिर भी तुम मेरी रक्षा नहीं कर सकी अब तुम जहाँ हो वहीँ पड़ी रहो|”


तब से बीमारियाँ गन्दगी में ही पड़ी रहती है और महनत करने वाला अनपढ़ आदमी भी स्वस्थ जीवन जीता है| बस यही नियम आज तक चला आ रहा है|


इसीलिए कहा गया है, “हमेशा महनत करते रहना चाहिए| महनती व्यक्ति हमेशा स्वस्थ व् सफल जीवन जीता है|”



पढ़ें :- बूढी माँ के पंच रत्नों की कहानी !

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Saturday, 26 May 2018

कोरा कागज़ | Real Love Story in Hindi

कोरा कागज़ | Real Love Story in Hindi
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बात लगभग 40 साल पहले की है जब विवाह को दो दिलों का मेल ना समझ कर बस एक रस्म की तरह निभाया जाता था| लेकिन जब दो अजनबी अचानक अपनि ज़िन्दगी किसी के साथ बाँटने लग जाए, जब किसी के लिए दिल में सम्मान के भाव आने लग जाए तो प्यार हो ही जाता है| खैर चलिए इतना तो आप जानते ही है और यह भी जान गए होंगे की हम आपको आज यह प्यार मुहोब्बत वाली बातें क्यों बता रहें हैं, जी हाँ आज हम आपके लिए प्यार भरी एक और कहानी लेकर आए हैं, कोरा कागज़ | Real Love Story in Hindi





                                              कोरा कागज़ | Real Love Story in Hindi


रश्मिता घर में सबसे चंचल थी| दिन भर मस्ती करना, घर में धमा-चोकड़ी करना और इन सब से मन भर जाए तो मुहोल्ले भर की आंटियों-चाचियों के घर टटोल आना| बस उसका दिन भर का यही काम था| यूँ कहें की मुहोल्ले की जान थी हमारी 14 बरस की रश्मि|  पढाई-लिखाई से दूर-दूर तक कोई नाता न था| हालाँकि आज से 40 बरस पहले उस ज़माने में  लड़कियों की पढाई-लिखी पर ध्यान कौन देता था| वैसे तो रश्मि घर में सबकी लाडली थी लेकिन अपने दादाजी की वो जान थी| बचपन से अपने दादाजी से ही उसने ज़िन्दगी का पाठ पढ़ा था| अक्सर दादाजी रश्मिता को चिढाने के लिए उस से उसकी शादी की बात करते लेकिन शादी की बात सुनते ही रश्मिता ऐसे खीजती मानो आज ही उसकी शादी हो रही हो|


एक दिन घर में दादाजी के बचपन के एक बहुत पुराने मित्र दादाजी से मिलने आए| रश्मिता ने उनके पैर छुए और उनके लिए पानी लेकर आई| दादाजी ने रश्मिता का परिचय करवाते हुए रश्मिता से कहा, “रश्मि, पहचाना इन्हें…ये वही है हमारे चूरन वाले साथी”| दादाजी की बात सुनकर रश्मिता खिलखिला उठी| लेकिन रश्मिता की खिलखिलाहट दादाजी के मित्र को इतनी पसंद आई की उन्होंने रशिता को अपने घर की बहु बनाने का फैसला कर लिया और वहीँ रिश्ते की बात भी कर ली|


अपनी फुल सी बेटी के लिए इतने अच्छे घर से रिश्ता आने पर दादाजी ख़ुशी से भर उठे| अगली बसंत पर बड़ी धूमधाम से रश्मि बिटिया की शादी करने का फैसला लिया गया| रश्मि को जैसे ही अपनी शादी के बारे में पता चला वह फुट-फुट कर रोने लगी| उसे लगा मनो उसका पूरा घर, दादाजी और उसका पूरा परिवार पीछे छूटता चला जा रहा हो|


खैर यह तो होना ही था| एक 14 बरस की लड़की को शादी के बारे में सिर्फ इतना ही पता था की उसे अब अपना घर छोड़कर किसी और के घर में ज़िन्दगी भर रहना है| इसी बिच रश्मिता की शादी बड़ी धूमधाम से हुई और रश्मिता की मुलाकात पहली बार अपने पति से हुई और अगले ही दिन रश्मिता के पापा रश्मिता को लेने आ गए|


बस फिर रश्मिता का आना जाना लगा रहा| कभी पीहर तो कभी ससुराल| लेकिन पति से अभी तक नही बन पाई थी| अक्सर ही दोनों बच्चों की तरह झगड़ते रहते| उस दिन भी रश्मि अपने पति से रूठी हुई थी की रश्मिता के पिताजी रश्मिता को लेने आ गए|


मायके जाते हुए रश्मिता ने टोकते हुए अपने पति से कहा, “अब में नहीं आउंगी आपके घर”
रश्मिता के पति ने भी गुस्से में कहा, “आना भी मत, जब तक में ना बुलाऊ”
रश्मिता ने चुटकी लेते हुए कहा, “अच्छा, तो मुझे कैसे पता चलेगा कि आपने बुलाया है या नहीं”
कुछ सोचते हुए रश्मिता के पति ने कहा, “जब तुम्हें कोई कोरा कागज़ दिखाए तो समझ जाना मैंने बुलाया है|


मायके में रश्मिता के दिन बहुत अच्छी तरह बीते| जब कोई रश्मि से उसके पति के बारे में पूछता तो वह चुटकी लेते हुए कहती, “अच्छे हैं, पर थोड़े बुद्धू हैं|” और सब मुस्कुरा जाते…
लगभग 15 दिन बाद रश्मिता के ससुरजी रश्मिता को लेने आए| रश्मिता ने उनके सामने कुछ दिन और मायके में रहने की इच्छा जताई| ससुर जी ने भी रश्मिता की बात का सम्मान रखते हुए हामी भर दी|
कुछ दिन बीतने पर जेठ जी आए| हालाँकि तब तक रश्मिता को भी ससुराल की याद सताने लगी थी लेकिन उसे अभी तक कोरे कागज़ का संदेसा नहीं मिला था| इसलिए रश्मिता ने माँ से ससुराल ना जाने का बहाना बना दिया| माँ ने रश्मिता को बहुत समझाया लेकिन रश्मिता ने किसी की एक ना सुनी| जेठ जी भी चले गए|


रश्मिता के ससुराल में रश्मिता के ससुराल आने पर मना करने पर सब परेशान थे| इधर रश्मिता के परिवार वाले भी रश्मिता को समझाने में लगे थे लेकिन रश्मिता किसी की बात मानने को तैयार ना थी| किसी को समझ नहीं आ रहा था की आखिर माजरा क्या है| ससुराल में यह चर्चा चल ही रही थी की तभी रश्मिता के पति ने “कोरे कागज़” वाली पूरी बात बताई|


अगले ही दिन रश्मिता के ससुरजी कोरे कागज़ के साथ रश्मिता को लेने आए| रश्मिता तो इसी पल के इंतजार में थी, कोरे कागज़ पर अपने पति का नाम लिख, अपना सामान बांध, रश्मिता अगले ही दिन ससुराल पहुँच गई|


लेकिन अपने पति के लिए उसके दिल में अब सब कुछ बदल चूका था| रस्मिता को अब अपना जीवन साथी मिल चूका था| आज जी भर कर रश्मिता ने अपने पति से बातें की लेकिन कोरे कागज़ वाली बात को लेकर दोनों सालों तक खिलखिलाते रहे…..


कोरा कागज़ | Real Love Story in Hindi


यह भी पढ़ें:- बरसात | Barsaat Hindi Kahani



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ननंद | Emotional Story in Hindi | Hindi Kahaniyan

ननंद | Emotional Story in Hindi | Hindi Kahaniyan
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दुनियां में हर इन्सान की अहमियत है और हर एक इन्सान की अपनी एक अलग सोच| इस दुनियां में हर इन्सान दुनिया की सोच बदलने की ताक़त रखता है| आज की हमारी युवा पीढ़ी और परिवार के बिच गई मुद्दों पर अलग-अलग सोच है| हमारी आज की कहानी इसी सोच के एक पहलु को बयां करती है, आइये पढ़ते हैं ननंद | Emotional Story in Hindi






                           ननंद | Emotional Story in Hindi


शिखा !  परिवार की लाडली बिटिया या फिर यूँ कहें की परिवार की आन, बान और जान| जब घर में होती तो ऐसा लगता मानों घर में आसमान टूट पड़ा हो| घर में इधर उधर धमा-चोकड़ी करना और खूब सारी बातें करना उसके पसंदीदा कामों में से एक था| शिखा के दादाजी शिखा को बहुत प्यार करते थे, लेकिन आजकल उन्हें शिखा की एक चिंता और खाए जा रही थी और वो थी शिखा की शादी की चिंता| बस दादाजी अब हर परिवार में शिखा का ससुराल ढूंढते| लेकिन शिखा को शादी नाम से ही इतनी चिढ थी कि शादी का नाम सुनते ही वह गुस्सा होकर, मुह फुला कर दुसरे कमरे में बैठ जाती|


खैर, थोड़ी देर में उसका गुस्सा खुद-ब-खुद उतर जाता और वो वापस अपनी धमा-चोकड़ी में व्यस्त हो जाती| काफी खोज-बिन के बाद भी शिखा के दादाजी को कोई ऐसा परिवार नज़र नहीं आया जहाँ वे अपनी लाडली बिटिया की शादी कर सके| इसलिए उन्होंने अपने बचपन के दोस्त से इस बारे में राय लेने का निश्चय किया| बस फिर क्या था वे अपने दोस्त रायबहादुर से मिलने बरेली की और निकल पड़े |


अगले दिन जब वह बरेली पहुंचे तो रायबहादुर ने स्टेशन पर ही उनके लिए गाड़ी भेज दी थी| 10 साल बाद अपने बचपन के दोस्त से मिलने के लिए वे भी बड़े उतावले थे| गाडी धीरे-धीरे रायबहादुर के घर की और बढ़ी ! बड़ा सा बंगलो, बंगलों के आगे बगीचा, गाड़ियाँ और  नोकर-चाकर देख दादाजी का मन ख़ुशी से भर गया|


इन 10 सालों में रायबहादुर ने कितनी तरक्क्की कर ली है, नहीं तो 10 साल पहले रायबहादुर के पास था ही क्या| बस यही सब सोचते-सोचते शिखा के दादाजी अपने दोस्त के बंगलो पहुँच ही गए|


गाड़ी की हॉर्न की आवाज के साथ ही रायबहादुर घर के बाहर अपने दोस्त के स्वागत के लिए आ गए थे| अपने दोस्त को गले लगाकर वे दादाजी को अन्दर ले गए| घर अन्दर से भी काफी शानदार था, अपने दोस्त की सम्पन्नता को देख शिखा के दादाजी भी फुले नहीं समाए|


ननंद | Emotional Story in Hindi


चाय-नाश्ता के बाद रायबहादुर ने उनके खास दोस्त से आने का कोई खास कारण पुछा|  दादाजी ने पोती की शादी के लिए एक अच्छा सा परिवार ढूंढने की का काम सोंपते हुए बिटिया का फोटो रायबहादुर के हाथ में सोंप दिया|


रायबहादुर भी अपने बेटे विक्रम के लिए एक सुयोग्य कन्या की तलाश में थे| तीखे नैन नक्श, चहरे पर तेज और एक बार में ही किसी को पसंद आने वाली शिखा बिटिया को फोटो में देखकर ही उन्होंने शिखा को अपने घर की बहु बनाने का फैसला कर लिया|


रायबहादुर इतना सोच ही रहे थे की इतने में उनका बेटा विक्रम आ गया| विक्रम ने दादाजी के पैर छुए और हाल-चाल पूछने के बाद ऑफिस की और निकल गया| विक्रम के जाने के बाद रायबहादुर ने अपने दोस्त से विक्रम और शिखा के सम्बन्ध के लिए पेशकश की| शिखा के दादाजी को लगा जैसे रायबहादुर ने उनके मुह की बात छिन ली हो|


खेर, प्रसंन्नता से विदा लेकर अपने घर आने का कहकर दादाजी अपने घर की और निकल गए|


विक्रम को शिखा बहुत पसंद थी| लेकिन विक्रम की माँ, विक्रम की शादी अपने से भी बड़े घर में करना चाहती थी लेकिन विक्रम के मनाने पर वह मान गई और तय समय पर विराम और शिखा की शादी हो गई|


ससुराल में शिखा के साँस-ससुर, विक्रम के बड़े भैया-भाभी और शिखा की ही उम्र की एक ननंद थी रागिनी| अपनी साद्की और सबका अच्छे से ख्याल रखने के कारण शिखा ने घर में सबके दिलों में जगह बना ली| लेकिन अपनी तमन कोशिशों के बावजूद अपनी सासू- माँ  का प्यार पाने में असफल रही|वह शिखा के हर काम में कुछ ना कुछ गलती निकाल ही देती थी|


अपनी शादी की रात को ही विक्रम ने शिखा से साफ-साफ कह दिया था,की”घर के किसी भी मामले में में बिलकुल नहीं बोलूँगा| ना तो में किसी बात पर माँ से बहस करूँगा और ना ही तुम्हारा साथ दूंगा| तुम्हें अपनी समझदारी से ही काम लेना होगा|”


लेकिन शिखा की लाख कोशिशों के बावजूद भी सासू-माँ के व्यव्हार में कोई परिवर्तन नहीं आ रहा था| शिखा की ननद जरुर उसकी माँ से शिखा भाभी के प्रति इस तरह के व्यहवार पर उलझ जाती लेकिन इस से भी केवल बात बढ़ने के अलावा कुछ नहीं होता| इसी तरह करीब एक साल निकल गया| शिखा और विक्रम को जुड़वाँ बेटियाँ हुई| यह समय शिखा के लिए अग्नि परीक्षा का समय था| शिखा का दर्द शिखा के लिए आंसू बन गया था ससुराल में शिखा को सम्हालने वाला कोई नहीं था और विक्रम और उनके पापा ने शिखा को अपने मायके भेजने के लिए पहले ही मना कर दिया था|


ननंद | Emotional Story in Hindi


एक दिन रागिनी कॉलेज से आई तो उसने सभी को कॉलेज के सालाना कार्यक्रम में आने के लिए कहा और यह भी कहा की कॉलेज में उसकी भी दो थी प्रस्तुतियां है इसलिए आप सभी का चलना बहुत ज़रूरी है| खैर, ना चाहते हुए भी शिखा को अपनी दोनों जुड़वाँ बेटियों के साथ रागिनी के कॉलेज जाना पड़ा|


कार्यक्रम की शुरुआत में गीत संगीत की कई प्रस्तुतियां हुई| उसके बाद माडलिंग राउंड शुरू हुआ| दर्शकों ने तालियों के साथ सभी का उत्साहवर्धन किया| माडलिंग में रागिनी ने भी हिस्सा लिया था| आखरी राउंड में रागिनी के साथ चार और लड़कियों को सेलेक्ट किया गया जहाँ सभी से जज द्वारा एक-एक सवाल पूछकर विजेता घोषित करना था| सवाल-जवाब का दौर शुरू हुआ| इसी कड़ी में जज साहिबा ने रागिनी से सवाल पुछा, “अगर घर में तुम्हारी माँ और भाभी में से किसी एक का साथ देना हो तो तुम किसका साथ दोगी”


पुरे सदन में ख़ामोशी छाई थी| सभी रागिनी के ज़वाब की प्रतीक्षा कर रहे थे| तभी रागिनी ने थोडा आगे बढ़कर कहा, “अगर भाभी सही हो तो अपनी भाभी का”


जज साहिबा ने आगे पुछा, ” क्यों ?”


रागिनी ने ज़वाब दिया, “क्यों की मुझे भी कल किसी की भाभी बनना है”


जवाब सुनते ही पुरे सदन में तालियाँ गूंज उठी| सभी रागिनी की सोच और उसके सटीक जवाब की प्रशंशा कर रहे थे|


रागिनी को विजेता घोषित किया गया| पुरुस्कार लेने से पहले रागिनी ने सभी से कुछ कहने के लिए माइक थामते हुए कहा, “हर बेटी अपनी माँ से बहुत प्यार करती है और माँ भी अपनी बेटी के दिल के सबसे करीब होती है| इसी तरह हमारे घर की बहुएं भी तो किसी की बेटियां है| आज हम किसी की बेटियां है कल से किसी की भाभियाँ और बहुएं बनेंगी| अगर कल से हमें कुछ दुःख हुआ तो हमारी माँ को भी दुःख होगा और इसी तरह हमारे घर की बहु को दुःख हुआ तो उनकी माँ को भी दुःख पहुंचेगा| और इस दुनियां में किसी भी इन्सान को किसी की भी माँ को दुःख  पहुँचाने का कोई हक़ नहीं है इसीलिए हर साँस अपनी बहु को अपनी बेटी समझे तो आगे चलकर उनकी बेटी भी खुश रहेगी|”


रागिनि के इतना कहते ही पूरा सदन एक बार फिर तालियों की गडगडाहट से गूंज उठा|


ननंद | Emotional Story in Hindi


                         तालियों की गडगडाहट के बिच ही शिखा की साँस ने शिखा को गले से लगा लिया|


पढ़ें कैसे एक छोटे से बाचे ने अपनी नादानी से एक बड़े झगडे को सुलझा दिया :- हिंदी कहानी -पिज़्ज़ा 

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Thursday, 3 May 2018

Sanders admits White House’s story about Comey firing has changed, argues it doesn’t matter – ThinkProgress

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During his train wreck of an interview on Hannity on Wednesday night, new Trump attorney Rudy Giuliani explained that the president fired then-FBI director James Comey because Comey refused to publicly announce that Trump “wasn’t a target” of the FBI’s investigation of his campaign.


There’s just one problem. Giuliani’s explanation for Comey’s firing differs from two previous ones that have already been offered by the White House — the official line, which was that Comey mishandled the Hillary Clinton email investigation; and the one Trump offered NBC’s Lester Holt, which was that he fired Comey because he was frustrated with the Russia investigation.



On Thursday, Press Secretary Sarah Huckabee Sanders was asked to reconcile team Trump’s shifting rationales for Comey’s firing. She responded with the verbal equivalent of the shrug emoji.


“There were a number of reasons that James Comey was fired. The president has named several of them,” Sanders said. “But the bottom line is, the president doesn’t have to justify his decision. The president has the authority to fire and hire, and I think every single day we’ve seen that he made the right decision in firing James Comey.”



Despite what Sanders would have you believe, the White House’s changing story could cause problems for Trump. Part of special counsel Robert Mueller’s investigation pertains to whether Trump obstructed justice when he fired Comey amid an active FBI investigation into his campaign. The answer hinges on Trump’s motivations.



Trump himself has said contradictory things about why he fired Comey. Though he initially admitted he fired him because of the Russia investigation, Trump recently tried to walk that back in a tweet proclaiming that “the worst FBI Director in history, was not fired because of the phony Russia investigation where, by the way, there was NO COLLUSION (except by the Dems)!”




In that tweet, Trump did not cite a reason for Comey’s firing. The implication, however, is that Comey’s poor character justified his termination. Giuliani furthered that effort during his interview with Hannity, at one point calling Comey “a very perverted man.”












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जिस जनरल थिमैया का नाम लेकर PM मोदी ने पंडित नेहरू पर साधा निशाना, पढ़े उनकी Story

जिस जनरल थिमैया का नाम लेकर PM मोदी ने पंडित नेहरू पर साधा निशाना, पढ़े उनकी
Story
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पीएम नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक के कलबुर्गी में तीन मई को अपनी चुनावी रैली में कांग्रेस पर हमलावर रुख अपनाते हुए कहा कि यह धरती वीरों की भूमि है लेकिन कांग्रेस सेना के बहादुर जवानों के त्‍याग का सम्‍मान नहीं करती. जब हमारे जवानों ने सर्जिकल स्‍ट्राइक किया तो कांग्रेस ने उस पर सवाल उठाए. वे मुझसे सर्जिकल स्‍ट्राइक का सबूत मांगते रहे. सर्जिकल स्‍ट्राइक के बाद कांग्रेस के एक वरिष्‍ठ नेता ने हमारे मौजूदा आर्मी चीफ को 'गुंडा' कहा. इतिहास गवाह है कि इस धरती के वीर फील्‍ड मार्शल करियप्‍पा और जनरल थिमैया के साथ कांग्रेस सरकार ने कैसा बर्ताव किया? जनरल थिमैया को तत्‍कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू और रक्षा मंत्री कृष्‍णा मेनन ने अपमानित किया. इस संदर्भ में इतिहास के पन्‍नों को उलटकर जनरल थिमैया की कहानी पर आइए डालते हैं एक नजर:


जनरल कोडनडेरा सुब्‍बैया थिमैया
1906 में कर्नाटक में जन्‍मे थिमैया उसी कोडनडेरा समुदाय से ताल्‍लुक रखते थे जिससे देश के पहले कमांडर-इन-चीफ जनरल करियप्‍पा संबंधित थे. जनरल केएस थिमैया 1957-61 तक आर्मी चीफ रहे. द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान इंफ्रेंट्री ब्रिगेड संभालने वाले एकमात्र भारतीय सैन्‍य अधिकारी थे. 1962 में भारत-चीन युद्ध के 15 महीने पहले वह रिटायर हुए. उसके बाद वह साइप्रस में संयुक्‍त राष्‍ट्र शांति रक्षक दल के कमांडर नियुक्‍त हुए. इसी ड्यूटी के दौरान 18 दिसंबर, 1965 को उनका निधन हो गया.


narendra modi
पीएम नरेंद्र मोदी ने कर्नाटक के कलबुर्गी में चुनावी रैली के दौरान कहा कि सर्जिकल स्‍ट्राइक के बाद कांग्रेस के एक वरिष्‍ठ नेता ने हमारे मौजूदा आर्मी चीफ को 'गुंडा' कहा.


विवाद
शिव कुमार वर्मा की किताब 1962 द वार दैट वाज नाट (1962 The War That Wasn't) में जनरल थिमैया के 1959 में इस्‍तीफा देने की घटना का विस्‍तार से जिक्र किया गया है. उसमें बताया गया है कि चीन के मोर्चे पर भारत की नीतियों से शीर्ष स्‍तर पर मतांतर था. उसी कड़ी में रक्षा मंत्री कृष्‍णा मेनन और थिमैया की मीटिंग हुई. वहां पर मेनन ने जनरल से कहा कि वह अपनी बात प्रधानमंत्री से सीधे कहने के बजाय पहले उनसे साझा कर मामले को इसी स्‍तर पर सुलझाएं. इसके साथ ही यह कहते हुए मेनन ने मीटिंग खत्‍म कर दी कि यदि मसले सार्वजनिक हुए तो उसके राजनीतिक प्रभाव की कीमत चुकानी होगी. इसके तत्‍काल बाद थिमैया ने इस्‍तीफा दे दिया.


प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने तत्‍काल उनको अपने पास बुलाया और लंबी बातचीत के बाद देश हित में आसन्‍न चीनी खतरे को देखते हुए इस्‍तीफा वापस लेने का आग्रह किया. नतीजतन जनरल थिमैया ने इस्‍तीफा वापस ले लिया. किताब के मुताबिक थिमैया के जाने के बाद उनके इस्‍तीफे की खबर को जानबूझकर मीडिया के समक्ष लीक कर दिया गया, जबकि इस्‍तीफे में लिखी बातों को छुपा लिया गया. उसका नतीजा यह हुआ कि अगले दिन सभी अखबारों की सुर्खियां जनरल थिमैया के इस्‍तीफ से पटी हुई थीं.


उसके दो दिन बाद दो सितंबर, 1959 को पंडित नेहरू ने संसद में इस मसले पर बयान देते हुए कहा कि उनके आग्रह को मानते हुए आर्मी चीफ ने इस्‍तीफा वापस ले लिया है. उन्‍होंने मिलिट्री पर सिविलयन अथॉरिटी की सर्वोच्‍चता बताते हुए कहा कि दरअसल अलग मिजाज के व्‍यक्तित्‍वों के कारण ऐसी परिस्थिति उत्‍पन्‍न हुई. इसके साथ ही उन्‍होंने जनरल थिमैया की आलोचना करते हुए कहा कि भारत और चीन के बीच सीमा संकट के बीच वह पद छोड़ना चाहते हैं. जनरल थिमैया के त्‍यागपत्र के मजमून को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है.




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